तिरुपति की महिमा और वैष्णव जीवन के मायनों को समझाया

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न्याय परिक्रमा न्यूज़ चंडीगढ

श्री रामानुजाचार्य जयंती के मौके पर श्री माता मनसा देवी परिसर में स्थित संस्कृत गुरुकुल में भगवान श्री लक्ष्मीवेंकटेश का पहला ब्रह्मोत्सव मनाया गया

शालिग्राम भगवान् की विष्णु सहस्रानामावली से तुलसी पुष्पार्चना की गयी

पंचकूला, (अच्छेलाल), श्री माता मनसा देवी शक्तिपीठ, पंचकूला सेक्टर-5 के परिसर में स्थित श्रीमुक्तिनाथ वेद विद्याश्रम – संस्कृत गुरुकुल में भगवान श्री लक्ष्मीवेंकटेश का प्रथम ब्रह्मोत्सव (वार्षिकोत्सव) मनाया गया। इस मौके से भगवान् रामानुजाचार्य जी की जयन्ती भी मनाई गई। दोनों खास लम्हों को एक दिवसीय भव्य अनुष्ठान आश्रम में रखा गया। इस अनुष्ठान में मुख्य यजमानत्व के रूप में सीए अश्विनी गुप्ता रहे। उनके साथ गुरुकुल के संरक्षक दिनेश सिंगला, उपाध्यक्ष राकेश बंसल, सचिव जयकिशन सिंगल, कोषाध्यक्ष जनक राज गुप्ता और सभी श्रद्धालुु मौजूद रहे। इस उत्सव में आरती-भोग के बाद पहुंचे सभी सभी श्रद्धालुुओं ने भगवान का आशीर्वाद लिया और भंडारा प्रसाद ग्रहण किया। इसकी शुरुआत सुबह पूजा और हवन के साथ हुई। उसके बाद आचार्य श्रीनिवासचार्य और उनके छात्रों ने वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए भगवान श्री लक्ष्मीवेंकटेश का विविध रसों एवं औषधियों से तैयार जल से उनका दिव्याभिषेक किया। इस दौरान शालिग्राम भगवान् की विष्णु सहस्रानामावली (एक हजार) नामों से तुलसी पुष्पार्चना की गयी। इसके बाद सत्संग का आयोजन हुआ जिसमें स्वामी जी ने श्रद्धालुओं को भगवान वेंकटेश की महिमा के बारे में बताया। किस तरह भगवान आज भी इस कलयुग में तिरुपति स्थित वेंकटाद्रि पर्वत पर अपने भक्तों को साक्षात दर्शन दे रहे हैं। स्थान के विषय में बताते हुए कहा, वेंकटाद्रि के समान और कोई दूसरा स्थान नहीं हैं और वेंकटेश के समान कोई अन्य देवता नहीं है। उन्होंने ये भी बताया कि किस तरह एक वैष्णव का जीवन होना चाहिए।

ब्यूरों रिपोर्टः कुमार योगेश/अच्छे लाल(चंडीगढ)

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